Self Enquiry - Hindi (आत्म-अन्वेषण)

Rs.30/-

गंभीरम् शेषाय्यर ने जो प्रश्न महर्षि से पूछे उनके उत्तर महर्षि ने काग़ज़ के टुकड़ों पर लिखकर दिए। इनके आधार पर तमिल भाषा में 'विचार संग्रहम्' नाम का एक ग्रन्थ बना। विचार संग्रहम् का अंग्रेज़ी अनुवाद डा. टी.एम.पी. महादेवन ने किया जिसका यह हिन्दी अनुवाद है। पुस्तक से एक अंश :

जीव स्वयमेव शिव है। शिव स्वयं जीव हैं। यह सच है कि जीव, शिव के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। जब दाना छिलके के भीतर होता है तो उसे धान कहते हैं, छिलका हटा लेने पर इसे चावल कहा जाता है। इसी प्रकार जब तक कोई कर्म-बन्धन में है, वह जीव रहता है, जब अज्ञान का बन्धन टूट जाता है तो वह शिव इष्ट के रूप में प्रकाशित होता है। श्रुति, शास्त्र, ऐसा उद्घोष करतें है। इसलिए जीव जो मन है, वास्तव में शुद्ध आत्मा है; किन्तु इस सत् के विस्मरण के कारण, यह स्वयं को एक वैयक्तिक आत्मा के रूप में कल्पना करता है तथा मन के रूप में बंधित हो जाता है।

pp.33+vii


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