Prani Mitra Bhagavan Ramana - Part I (Hindi)

Rs.90/-

जो शक्ति संसार का नियमन कर रही है, वही हमारे भीतर रहकर हमें भी चलाती है। उस शक्ति को हम आत्मा कहते हैं, वही सत् वस्तु है। उस आत्मा का अनुभव हो गया तो हम जान सकते हैं कि सभी जीवों में हम ही हैं। सर्वत्र उस आत्मा का अनुभव हो जाने के बाद हमसे पृथक कुछ नहीं रह जाता। ऐसी अवस्था में गाय, पशु-पक्षी ही नहीं बल्कि सभी जीवों के साथ हमें अनुकूल जीवन जीने का सहज भाव मिल जाता है। यह भगवान् रमण के अरुणाचल वास से हमें स्पष्ट होता है।

हम सर्वव्यापी आत्मशक्ति हैं, इसे अनुभव कर भगवान् रमण तिरुवण्णामलै में अपने पचास साल से अधिक के वास में प्राणी मित्र बनकर, उनको आध्यात्मिक अनुभव और मुक्ति देकर अनुगृहीत करते हैं; इस बारे में श्री रमणाश्रमम् की पुस्तकों में पूर्ण विस्तार से लिखा हुआ है। बन्दरों का राज्य परिपालन उन्हें भली भाँति ज्ञात होने के कारण कई बन्दर राजाआें ने उनके पास आकर अपनी-अपनी समस्याएँ सुलझाईं और सुखी जीवन बिताया। बन्दरिया नवजात शिशु को उन्हें दिखाकर उनका अनुग्रह पाती। कई मोर उनकी सान्निध्य में आए जिनकी संतति आज भी श्री रमणाश्रमम् में हैं। साँप उन्हें अपना मानकर, समत्व दृष्टि से प्यार से उनके शरीर पर रेंगते। परस्पर द्वेष भाव रखनेवाले साँप और मोर उनके समक्ष मैत्री भाव से नृत्य करते। पक्षी भी उनके पास घोंसला बनाकर उनकी प्यार भरी सुरक्षा पाते। इस तरह के सैकड़ों चमत्कारों का वर्णन किया जा सकता है, जो स्वयं में एक महाकाव्य बन जाएगा। इनमें से कुछ को चुनकर हरिहर सुब्रमणियन ने, हमारे लिए इसे सरल भाषा में, संवाद रूप में प्रस्तुत किया है। जैसे कई प्राणियों ने भगवान् रमण की कृपा पाई है, वैसे ही हम भी उनकी कृपा पाकर श्रेष्ठ हो जाएँ।

pp. 54 + Viii

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